Nikay Chunav झुंझुनूं नगर परिषद में कौन बनेगा सभापति? कांग्रेस में नामों पर मंथन, भाजपा भी जुटी जोड़-तोड़ में
झुंझुनूं। नगर परिषद के चुनाव परिणाम सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल सभापति की कुर्सी को लेकर खड़ा हो गया है। झुंझुनूं नगर परिषद के 60 वार्डों में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद माना जा रहा है कि सभापति पद पर कांग्रेस का दावा मजबूत है। हालांकि, सभापति के नाम को लेकर पार्टी के भीतर मंथन और सियासी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
देखें : झुंझुनू नगर परिषद चुनाव रिजल्ट
कांग्रेस में इस बार तैयब अली की बजाय किसी नए चेहरे को सभापति बनाने की चर्चा है। अल्पसंख्यक पार्षदों में किसी एक नाम पर सहमति बनाने की कोशिश की जा सकती है। इस दौड़ में अब्दुल्ला अगवान, उमर कुरैशी समेत अन्य नामों को लेकर राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं।
अल्पसंख्यक पार्षदों में एक नाम पर सहमति बनाने की कोशिश
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सभापति के नाम पर पार्षदों के बीच सहमति बनाने की होगी। पिछली बार भी सभापति पद के लिए नगमा बानो के नाम पर अल्पसंख्यक पार्षदों की शुरुआत में एक राय नहीं बन पाई थी। इसके बाद सांसद बृजेंद्र ओला की समझाइश के बाद नगमा बानो के नाम पर सहमति बनी थी।
नगमा बानो, तैयब अली की पुत्रवधु हैं। ऐसे में इस बार कांग्रेस नेतृत्व परिवार के बजाय किसी नए चेहरे को मौका देने का फैसला कर सकता है। हालांकि, अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व और निर्वाचित पार्षदों की राय के बाद ही सामने आएगा।
सहमति नहीं बनी तो वीरेंद्र डारा का नाम हो सकता है आगे
यदि अल्पसंख्यक पार्षदों में किसी एक नाम पर सहमति बनाने की कोशिश सफल नहीं होती है, तो कांग्रेस की ओर से निर्दलीय पार्षद वीरेंद्र डारा को आगे किए जाने की चर्चा भी है।
वीरेंद्र डारा पूर्व में नगर परिषद के उप सभापति रह चुके हैं और इस बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतकर पार्षद बने हैं। राजनीतिक तौर पर उन्हें सांसद बृजेंद्र ओला के करीबियों और भरोसेमंद नेताओं में माना जाता है। ऐसे में सभापति पद के लिए उनका नाम भी कांग्रेस के संभावित विकल्पों में शामिल बताया जा रहा है।
हालांकि, अभी तक कांग्रेस की ओर से सभापति पद के लिए किसी नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
भाजपा भी जोड़-तोड़ में जुटी, निर्दलीय पार्षदों पर नजर
दूसरी ओर, भाजपा ने भी सभापति की कुर्सी हासिल करने की कोशिशें तेज कर दी हैं। हालांकि भाजपा अभी जादुई आंकड़े से काफी दूर नजर आ रही है। इसके बावजूद पार्टी निर्दलीय पार्षदों के संपर्क में है और कांग्रेस खेमे में संभावित क्रॉस वोटिंग की संभावना को लेकर भी रणनीति बनाई जा रही है।
भाजपा की ओर से निर्वाचित पार्षदों की बाड़ेबंदी किए जाने की चर्चा है। बाड़ेबंदी में पहुंचे पार्षदों के मोबाइल फोन स्विच ऑफ बताए जा रहे हैं। पार्टी की कोशिश है कि निर्दलीय पार्षदों को अपने पक्ष में लाकर सभापति पद के चुनाव में मुकाबले को रोचक बनाया जाए।
विधायक राजेंद्र भांबू ने संभाला मोर्चा
भाजपा की ओर से सभापति चुनाव को लेकर विधायक राजेंद्र भांबू ने खुद मोर्चा संभाल रखा है। भाजपा खेमे में सभापति पद के संभावित दावेदारों के रूप में कई नामों की चर्चा है।
इनमें मनु धनखड़, लीलाधर जाखड़, डॉ. राजेश बाबल और पूजा संघी गुप्ता के नाम राजनीतिक चर्चाओं में शामिल हैं।
मनु धनखड़ को विधायक राजेंद्र भांबू का करीबी माना जाता है, जबकि लीलाधर जाखड़ पूर्व सांसद नरेंद्र कुमार के दामाद हैं। ऐसे में भाजपा के भीतर भी सभापति पद के लिए चेहरे को लेकर सियासी समीकरणों पर मंथन चल रहा है।
कांग्रेस का सभापति बनना फिलहाल मजबूत, लेकिन मुकाबला दिलचस्प
झुंझुनूं नगर परिषद में कांग्रेस के स्पष्ट बहुमत के चलते फिलहाल कांग्रेस का सभापति बनना सबसे मजबूत संभावना मानी जा रही है। लेकिन सभापति का चुनाव केवल पार्टी के बहुमत तक सीमित नहीं है। पार्षदों की व्यक्तिगत पसंद, गुटीय समीकरण और निर्दलीय पार्षदों की भूमिका भी अंतिम समय में महत्वपूर्ण हो सकती है।
यही वजह है कि चुनाव परिणाम आने के बाद अब सभापति के नाम को लेकर कयासबाजी का दौर तेज हो गया है।
कांग्रेस में नए अल्पसंख्यक चेहरे पर सहमति बनती है या फिर वीरेंद्र डारा जैसे अनुभवी चेहरे को मैदान में उतारा जाता है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। वहीं भाजपा भी निर्दलीय और संभावित क्रॉस वोटिंग के जरिए मुकाबले को बदलने की कोशिश में जुटी है।
फिलहाल राजनीतिक चर्चाओं में कांग्रेस का पलड़ा भारी नजर आ रहा है, लेकिन सभापति की कुर्सी पर अंतिम फैसला पार्षदों के समर्थन और पार्टी नेतृत्व की रणनीति से ही तय होगा।
