Aravalli Hills अरावली बचाओ अभियान: 100 मीटर ऊंचाई का पूरा मामला क्या है? Aravali Bachavo Abhiyan

Aravalli Hills Controversy अरावली बचाओ अभियान: 100 मीटर ऊंचाई का पूरा मामला क्या है?

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Aravali Bachavo Abhiyan अरावली बचाओ अभियान भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला अरावली पर्वतमाला को अवैध खनन, निर्माण और पर्यावरणीय क्षति से बचाने के लिए चलाया जा रहा एक व्यापक पर्यावरण आंदोलन है।

हाल के समय में इसमें “100 मीटर ऊंचाई” को लेकर विवाद और चर्चा तेज हुई है। आइए पूरा मामला सरल और विस्तृत रूप में समझते हैं।

1️⃣ अरावली पर्वतमाला का महत्व


• अरावली पर्वतमाला गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। इसका महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि:
• यह मरुस्थलीकरण रोकने में मदद करती है
• भूजल रिचार्ज का प्रमुख स्रोत है
• जलवायु संतुलन बनाए रखती है
• कई दुर्लभ वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का आवास है

2️⃣ 100 मीटर ऊंचाई का मामला क्या है?


सरकार और पर्यावरण से जुड़े नियमों में कई जगह यह प्रावधान सामने आया कि:

• 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र को अरावली की श्रेणी से बाहर माना जाए।
• यानी अगर किसी इलाके की पहाड़ी या भूमि 100 मीटर से कम ऊंची है, तो:
उसे अरावली क्षेत्र घोषित न किया जाए
• वहां निर्माण, खनन या अन्य गतिविधियों की अनुमति मिल सके

🔴 यहीं से विवाद शुरू हुआ

पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि:
• अरावली सिर्फ ऊंचाई नहीं, भू-आकृतिक (Geological) संरचना है
• 100 मीटर की सीमा तय करना वैज्ञानिक दृष्टि से गलत है
• इससे बड़े पैमाने पर खनन और रियल एस्टेट गतिविधियों को रास्ता मिल जाएगा

3️⃣ अरावली बचाओ अभियान क्यों शुरू हुआ?

इस अभियान के पीछे मुख्य कारण हैं:
• हरियाणा, राजस्थान और NCR क्षेत्र में तेजी से हो रहा खनन
• पहाड़ियों को काटकर फार्म हाउस, कॉलोनियां और सड़कें बनाना
• जंगलों का खत्म होना और भूजल स्तर का गिरना
• वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होना


अभियान का उद्देश्य है:
• अरावली को पूरी तरह संरक्षित क्षेत्र घोषित करवाना
• ऊंचाई आधारित छूट को खत्म करना
• खनन व निर्माण पर सख्त रोक लगवाना

4️⃣ कानूनी और सरकारी पक्ष

इस मुद्दे पर कई बार सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने:
• अरावली में खनन पर सख्त टिप्पणियां की हैं
• पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर रोक लगाई है
• हालांकि, अलग-अलग राज्यों की नीतियों और नियमों में अस्पष्टता के कारण यह मामला बार-बार विवाद में आ जाता है।

5️⃣ अगर 100 मीटर की शर्त लागू हुई तो क्या नुकसान?

• अरावली का बड़ा हिस्सा कानूनी सुरक्षा से बाहर हो जाएगा
• जल संकट और गंभीर होगा
• धूल-प्रदूषण बढ़ेगा, खासकर NCR क्षेत्र में
भविष्य में रेगिस्तान फैलने का खतरा

6️⃣ निष्कर्ष

अरावली बचाओ अभियान सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के पर्यावरण और जल सुरक्षा की लड़ाई है।
100 मीटर ऊंचाई का नियम अगर बिना वैज्ञानिक आधार के लागू होता है, तो इससे अरावली को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।

अरावली पर्वत श्रृंखला के सम्बंध में सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

अरावली पर्वत श्रृंखला के संबंध में 20 नवंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने खुद की बनाई हुई CEC (सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी) की सिफारिशों के आधार पर एक दिशा निर्देश जारी किया। इसके तहत अब केवल 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली संरचनाओं (टीलों) को ही ‘अरावली हिल’ माना जाएगा। यानी जिन पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम है, उनको ‘अरावली हिल’ नहीं माना जाएगा।

एक अन्य कमेटी FSI (Floor Space Index) की 2010 की एक रिपोर्ट के अनुसार अरावली पर्वत श्रृंखला में कुल 1281 पहाड़ हैं। जिनमें से 1048 पहाड़ ऐसे हैं, जो 100 मीटर ऊंचाई से कम हैं। सुप्रीम कोर्ट के नवीन निर्देशों के अनुसार 1048 छोटी पहाड़ियां खनन के दायरे में आ गईं। जो कि कुल अरावली के क्षेत्रफल का लगभग 90% बनता है।

अगर केन्द्र सरकार भविष्य में सुप्रीम कोर्ट के नवीन निर्देशों के आधार पर अरावली पर्वत श्रृंखला के इस 90% भाग पर नए खनन को स्वीकृतियां देती है तो पूरी अरावली पर्वत श्रृंखला का स्वरूप बिगड़ जाएगा।

CEC क्या है ?

यह समिति सुप्रीम कोर्ट ने सन् 2002 में बनाई थी। यह अदालत की एक सहायक समिति है। मुख्य रूप से यह वन, पर्यावरण और खनन जैसी गतिविधियों में सुप्रीम कोर्ट को तकनीकी रूप से सहायता करने का काम करती है। इसी समिति की सिफारिश के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने वर्तमान निर्देश दिए हैं। इस निर्णय में सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। सरकार को फिजूल ही बदनाम किया जा रहा है।

बस आशंका यही है कि अगर सरकार, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को मानती है तो अरावली पर्वत श्रृंखला के लिए घातक होगा। इसी का विरोध हो रहा है और होना भी चाहिए।

अरावली पर्वत श्रृंखला से महाराणा प्रताप के अकबर से संघर्ष के कारण लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। महाराणा प्रताप ने अपने जीवन के बहुत बड़े कालखंड तक इसी अरावली पर्वत श्रृंखला में शरण लेकर अकबर से युद्ध किया था और चित्तौड़ दुर्ग को छोड़कर बाकी के सारे मेवाड़ को पुन: जीत लिया था। इस पर्वतीय श्रृंखला का पर्यावरणीय महत्व भी है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपील करके इस निर्णय को रद्द करवाना चाहिए।